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रूस-यूक्रेन की जंग: अमेरिका की बादशाहत तय करेंगे युद्ध के नतीजे, क्या टूट जाएगा 'सुपरपावर' होने का तिलिस्म!

Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Fri, 25 Feb 2022 04:15 PM IST

सार

विदेशी मामलों के जानकार और पूर्व विदेश सेवा के अधिकारी डॉक्टर विजय चंद्रा कहते हैं कि हकीकत में अमेरिका बीते कुछ सालों से सिर्फ दलीलें और पुरानी ताकत का रुआब दिखाकर ही पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व कायम रखने की फिराक में लगा हुआ था। वे कहते हैं कि निश्चित तौर पर यह वक्त अमेरिका के लिए भी एक बड़ी परीक्षा के समान है...
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन। - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार

अभी पूरी दुनिया के छोटे बड़े तमाम देशों में यही आम धारणा है कि अमेरिका बहुत ताकतवर है। वह अपनी दखलंदाजी से दुनिया को चलाने का दमखम रखता है। लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध के दौरान या बाद में इस बात का भी फैसला हो जाएगा कि अमेरिका की बादशाहत अब वास्तव में पूरी दुनिया में है या उसकी पकड़ कमजोर हो रही है। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है इस पूरे युद्ध में निश्चित तौर पर यूक्रेन को सबसे भारी नुकसान हो रहा है लेकिन असली परीक्षा तो अमेरिका की ही है और शुरुआती दौर में इस बात का अहसास हो रहा है कि यूक्रेन पर हुआ हमला अमेरिका की कमजोर पड़ती हुई ताकत का ही एक उदाहरण है।
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विदेशी मामलों के जानकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं कि निश्चित तौर पर रूस और यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध में अमेरिका की असली परीक्षा हो रही है। वे कहते हैं 2008 के बाद अमेरिका वित्तीय संकट से जूझ रहा है। इसका कई जगहों पर स्पष्ट रूप से असर नजर भी आया है। खासतौर से विदेशी मामलों में किए जाने वाले दखल और उसके बाद हाथ पीछे खींच लेने वाले हालात से अमेरिका की बादशाहत में पहले से ही गिरावट दर्ज हुई है। प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं कि अगर अमेरिका अपने नजदीकी यूरोप में इस तरीके के किए गए हमले में कमजोर मुल्क यूक्रेन की मदद नहीं कर सकता है, तो इसके परिणाम पूरी दुनिया को किसी न किसी हमले के रूप में अलग-अलग क्षेत्रों में दिख सकते हैं।

क्या कमजोर हो रहा है अमेरिका?

प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं दुनिया के कई ताकतवर मुल्क हमेशा से अपने पड़ोस के देशों में युद्ध जैसी स्थितियों में रहे हैं। लेकिन एक आशंका और एक डर बना रहता था कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका कहीं कमजोर देशों के साथ खड़ा होकर युद्ध के हालातों में नतीजे ना बदल दे। लेकिन रूस और यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका को लेकर बने सभी ताकतवर देशों में उसके कमजोर होने का संदेश निश्चित तौर पर जाएगा। वह कहते हैं यूक्रेन पर हुआ हमला अमेरिका की कमज़ोर हो रही ताकत का उदाहरण भी है।

पूर्व राजनयिक डीपी देशपांडे कहते हैं कि यूक्रेन और रूस के युद्ध को सिर्फ इन दो देशों तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता है। क्योंकि इसके परिणाम सिर्फ यूक्रेन और रूस को ही नहीं भुगतने होंगे बल्कि इससे उपजे दूसरे हालात दुनिया के कई मुल्कों को युद्ध के मैदान में ढकेल देंगे। देशपांडे कहते हैं कि यह बात बिल्कुल सच है कि 2008 के बाद अमेरिका तमाम तरह के वित्तीय संकटों में उलझा रहा। यही वजह है कि उसकी ताकत कहीं न कहीं कमजोर भी हुई। जबकि इसी दौरान चीन बहुत मजबूती के साथ उभरकर बड़ी अर्थव्यवस्था बनने लगा। पूरी दुनिया में अगर आप अमेरिका रूस और चाइना को देखेंगे तो रूस की अर्थव्यवस्था और हालात चीन और अमेरिका के मुकाबले कमज़ोर स्तर पर हैं। लेकिन जिस तरीके से रूस ने अमेरिकी ताकत और नाटो जैसे संगठनों के हस्तक्षेप को दरकिनार करते हुए यूक्रेन पर हमला किया है उससे न सिर्फ नाटो जैसे संगठनों की मौजूदगी बल्कि अमेरिका की बादशाहत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यूक्रेन संकट के बाद चीन और ताइवान में युद्ध होने की संभावना

विदेशी मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर अभिषेक सिंह कहते हैं कि इस पूरे मामले में चीन को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उनका कहना है कि बीते काफी वक्त से चीन ताइवान पर हमले का माहौल बनाए हुए है। वह कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम संधियों और तमाम दबावों के चलते चीन ताइवान पर हमला नहीं कर रहा था। उनका कहना है रूस और यूक्रेन के युद्ध के बाद चीन और ताइवान में युद्ध होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। इसके पीछे की वजह बताते हुए प्रोफेसर अभिषेक कहते हैं कि चीन को इस बात का अंदाजा है कि अमेरिका जैसी ताकत जब यूरोप में दखल नहीं दे सकती है, तो एशिया में आकर वह कितना दखल देगी। इसके अलावा सिर्फ चीन ही नहीं बल्कि अन्य ताकतवर देश भी इस बात को मानेंगे की तमाम मदद के वायदों के बाद भी अमेरिका अगर यूक्रेन की मदद नहीं कर पाया तो अन्य मुल्कों के साथ कैसे और क्यों खड़ा होगा।

वह कहते हैं कि बीस सालों तक अमेरिका की अफगानिस्तान में मौजूदगी के दौरान न जाने कितने सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी। अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनावों में यह एक बड़ा मुद्दा भी रहा। इसलिए यही वजह है कि अब अमेरिका बेवजह अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए अपने जवानों की जान से समझौता भी नहीं करना चाहता है। हालांकि विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि अमेरिका को यह बिलकुल सहन नहीं होगा कि पूरी दुनिया में उसकी ताकत को कम करके आंका जाए। यह बात अलग है कि वह अन्य समझौतों, संधियों और अलग-अलग माध्यमों से खुद को सबसे बड़ा बता कर अभी भी अपनी पीठ ठोकता रहे।

यूक्रेन के साथ नहीं खड़ा है कोई मुल्क

विदेशी मामलों के जानकार और पूर्व विदेश सेवा के अधिकारी डॉक्टर विजय चंद्रा कहते हैं कि हकीकत में अमेरिका बीते कुछ सालों से सिर्फ दलीलें और पुरानी ताकत का रुआब दिखाकर ही पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व कायम रखने की फिराक में लगा हुआ था। वे कहते हैं कि निश्चित तौर पर यह वक्त अमेरिका के लिए भी एक बड़ी परीक्षा के समान है। हालांकि उनका कहना है कि कोई भी देश सीधे तौर पर किसी मुल्क की लड़ाई के लिए न तो अपने सैनिक भेजता है और न ही अपने संसाधनों के इस्तेमाल की अनुमति देता है। वे कहते हैं इसके लिए बाकायदा पहले से संधियां और समझौते होते हैं। यूक्रेन और रूस के मामले में उनका कहना है कि अमेरिका ने यूक्रेन को आश्वासन तो जरूर दिया था, लेकिन उसको बचाने जैसी कोई संधि या प्रस्ताव कभी नहीं रहा कि अगर यूक्रेन पर कोई मुल्क हमला करेगा तो यूक्रेन की तरफ से अमेरिका युद्ध लड़ेगा। विजय चंद्रा कहते हैं यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा कि उन्हें दुनिया का कोई मुल्क सपोर्ट नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा यूक्रेन को रूस से लड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है। उनके साथ इस वक्त दुनिया का कोई देश खड़ा नहीं है।

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